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84 साल की उम्र में IIM से MBA कर इतिहास रचने वाले वैज्ञानिक डॉ. गिरीश मोहन गुप्ता, छह दशक से भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक के स्तंभ

नई दिल्ली:

84 वर्ष की उम्र में जहां अधिकतर लोग शांति और सेवानिवृत्ति का जीवन चुन लेते हैं, वहीं भारत के वरिष्ठ वैज्ञानिक और उद्यमी डॉ. गिरीश मोहन गुप्ता ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। उन्होंने प्रतिष्ठित IIM संबलपुर से MBA की डिग्री पूरी की है—और यही नहीं, अब वे अपने तीसरे PhD की तैयारी में जुट चुके हैं।

लेकिन डॉ. गुप्ता की कहानी सिर्फ वृद्धावस्था में शिक्षा प्राप्त करने की उपलब्धि तक सीमित नहीं है। उनके पीछे लगभग 65 वर्षों की वैज्ञानिक, औद्योगिक और तकनीकी यात्रा है, जिसने भारत को स्वदेशी रक्षा क्षमता, रेलवे आधुनिकीकरण और ग्रामीण विकास के कई क्षेत्रों में नई पहचान दिलाई है।

Newst24.com के लिए तैयार यह विशेष रिपोर्ट उनके जीवन, उपलब्धियों और योगदान का विस्तृत दस्तावेज है।


दिबाई के साधारण परिवार से भारत के अग्रणी वैज्ञानिक बनने तक की यात्रा

डॉ. गिरीश मोहन गुप्ता का जन्म 10 अप्रैल 1941 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के दिबाई में हुआ। उनका बचपन साधारण वातावरण में बीता। पिता हरीशंकर गुप्ता स्थानीय व्यापारी थे और माता श्रीमती लक्ष्मी देवी गहन धार्मिक प्रवृत्ति की थीं, जिन्होंने जीवन के अंतिम 28 वर्ष हरिद्वार में ‘‘राधाकृष्ण मंदिर’’ की सेवा में बिताए।

परिवार में छह भाइयों में तीसरे क्रम के डॉ. गुप्ता के जीवन की दिशा उनके बड़े भाई चन्द्र मोहन गुप्ता, जो रेलवे वर्कशॉप में अभियंता थे, ने तय की। उन्होंने गिरीश को इंजीनियरिंग की ओर प्रेरित किया।

उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ी और आगे चलकर J.S. University, शिकोहाबाद से PhD की उपाधि प्राप्त की।


18 साल में करियर की शुरुआत, 33 में DCM के सबसे युवा महाप्रबंधक

डॉ. गुप्ता ने अपना पहला पेशेवर कदम सिर्फ 18 साल की उम्र में रखा।
उन्होंने Delhi Cloth Mills (DCM) में ट्रेनी इंजीनियर के रूप में काम शुरू किया। मेहनत और तकनीकी दक्षता के बल पर वे 14 वर्षों में 7 बार पदोन्नत हुए और 33 साल की उम्र में DCM के सबसे युवा जनरल मैनेजर (GM) बने।

हालाँकि उनके करियर का निर्णायक मोड़ तब आया जब देश ने 1962, 1965 और 1971 के युद्धों का सामना किया।
सीमा पर हथियारों, प्रोपेलेंट, सुरक्षा उपकरणों और तकनीक की कमी ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।

यही वह समय था जब उनके भीतर एक संकल्प जन्मा—

“भारत को आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।”


अमेरिका में उच्च पद, लेकिन देश सेवा के लिए Green Card छोड़कर लौट आए

1979 में वे अमेरिका के Pittsburgh Steel Inc. में Vice President–Energy Conservation बने।
कई वर्षों के कार्यकाल में उन्हें Green Card भी मिला, लेकिन 1983 में उन्होंने वह निर्णय लिया जिसे उनकी सबसे बड़ी राष्ट्रवादी पहल माना जाता है—

उन्होंने अपना Green Card त्याग दिया और भारत लौट आए।

उनके मन में स्पष्ट था:
भारत को उच्च-सुरक्षा बाड़, गोला-बारूद प्रोपेलेंट, रेलवे स्वचालन और औद्योगिक तकनीक के क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है।


‘Global Engineers’ की स्थापना—भारत के तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

भारत लौटकर डॉ. गिरीश मोहन गुप्ता ने ग्लोबल इंजीनियर्स की स्थापना की।
अगले चार दशकों में इस कंपनी ने ऐसे समाधान विकसित किए जो रक्षा, रेलवे, परमाणु और औद्योगिक क्षेत्रों में मील के पत्थर साबित हुए।


तारीखवार प्रमुख नवाचार — देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले तकनीकी कदम

1. उच्च सुरक्षा बाड़—Punched Tape Concertina Coil (1983–1987)

पंजाब सीमा पर यह तकनीक लागू की गई।
समय था 1980 के दशक का, जब पंजाब आतंकवाद की गंभीर चुनौती झेल रहा था।
इस बाड़ ने सीमा-पार घुसपैठ को बड़ी मात्रा में रोकने में मदद की।
इस उपलब्धि पर उन्हें राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन द्वारा सम्मानित किया गया।


2. ग्रामीण मोबाइल संचार प्रणाली (1998)

जब मोबाइल तकनीक भारत में प्रारंभिक चरण में थी, तब ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने के लिए उनकी टीम ने Mobile Telephone Exchange System विकसित की, जिसे ITI मनकापुर द्वारा स्थापित किया गया।


3. प्रोपेलेंट (Nitrocellulose) तकनीक का स्वदेशीकरण (2008)

उच्च-कैलिबर गोला-बारूद निर्माण में उपयोग होने वाली प्रोपेलेंट तकनीक पहले पूरी तरह विदेशों पर निर्भर थी।
ग्लोबल इंजीनियर्स ने इसे आंशिक रूप से भारत में विकसित किया, जिससे रक्षा क्षेत्र की दशकों पुरानी निर्भरता कम हुई।


4. पूर्णत: स्वचालित रेलवे कोच पेंटिंग प्लांट (2005–2011)

भारतीय रेलवे की 28 वर्कशॉप में ऑटोमेटेड पेंटिंग सिस्टम लगाए गए।
इससे मजदूरों को जहरीले धुएं से होने वाली बीमारियों का ख़तरा समाप्त हुआ।
HAL में भी यही तकनीक अपनाई गई।


5. फास्ट-ब्रीडर रिएक्टर—सोडियम कूलिंग सिस्टम (2013–2014)

NPCIL कलपक्कम में फास्ट-ब्रीडर रिएक्टर के लिए शीतलन प्रणाली का विकास किया।
यह भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण चरण था।


6. सोलर ग्रीनहाउस (2023)

डॉ. गुप्ता की सोलर ग्रीनहाउस तकनीक:

  • खुले खेत से 5–8 गुना अधिक उत्पादन
  • एक एकड़ संरचना से 400 यूनिट तक दैनिक बिजली उत्पादन

देने में सक्षम है।
इसे ग्रामीण विकास के एक गैर-लाभकारी मॉडल के रूप में लागू किया जा रहा है।


7. रेलवे सिमुलेटर (2024)

भारतीय रेलवे के लोको पायलटों के प्रशिक्षण के लिए आधुनिक सिमुलेटर तैयार किए गए।


आर्थिक प्रभाव — रोजगार, कर और विदेशी मुद्रा की बचत

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ग्लोबल इंजीनियर्स के योगदान का प्रभाव:

  • ₹1,020 करोड़ भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल योगदान
  • ₹105 करोड़ से अधिक कर भुगतान
  • 1,200 से अधिक नौकरियाँ (प्रत्यक्ष+अप्रत्यक्ष)
  • €55.6 मिलियन विदेशी मुद्रा की वार्षिक बचत

के रूप में आँका गया है।


सम्मान और पुरस्कार

डॉ. गुप्ता को अब तक:

  • दो राष्ट्रपति पुरस्कार
  • CII Industrial Innovation Award
  • 19 राष्ट्रीय + 2 अंतरराष्ट्रीय सम्मान
  • Golden Book of World Records में प्रविष्टि
  • Guinness World Record प्रक्रिया में

से सम्मानित किया जा चुका है।


सामाजिक पक्ष—ग्रामीण विकास से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक

तकनीकी कार्यों के अलावा डॉ. गुप्ता:

  • मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता
  • IIM Sambalpur में छात्रवृत्तियाँ
  • Earth Saviours Foundation सहायता
  • विवाह सहायता कार्यक्रम
  • 20 वर्षों से अधिक समय से मुफ्त होम्योपैथी क्लिनिक

जैसे कार्यों में भी जुड़े रहे हैं।


ओशो से आध्यात्मिक प्रेरणा

डॉ. गिरीश मोहन गुप्ता कई दशकों से ओशो के विचारों से प्रभावित रहे हैं।
वे कहते हैं—

“विज्ञान और आध्यात्म—दोनों मिलकर जीवन को संतुलित बनाते हैं।”


वर्तमान परियोजना: झांसी रक्षा औद्योगिक गलियारे में 166 हेक्टेयर का प्रोपेलेंट प्लांट

इस समय डॉ. गुप्ता उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे (Jhansi node) में 166 हेक्टेयर में स्वदेशी विस्फोटक और प्रोपेलेंट निर्माण सुविधा स्थापित कर रहे हैं।
यह परियोजना भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता को बड़ा आधार देने वाली मानी जा रही है।


निष्कर्ष—एक जीवन, जो बताता है कि “सीखने की कोई उम्र नहीं”

डॉ. गिरीश मोहन गुप्ता की कहानी सिर्फ उपलब्धियों की नहीं है—यह संकल्प, सेवा, नवाचार और राष्ट्रप्रेम की कहानी है।
84 वर्ष की आयु में प्रयास कर MBA प्राप्त करना यह संदेश देता है कि जीवन में किसी भी लक्ष्य के लिए उम्र कभी बाधा नहीं होती।

उनका सफर भारत के वैज्ञानिक और औद्योगिक इतिहास का एक प्रेरक अध्याय है।

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