HomeBlogस्तनपान सप्ताह: जच्चा-बच्चा और समाज के बेहतर भविष्य में निवेश की पुकार

स्तनपान सप्ताह: जच्चा-बच्चा और समाज के बेहतर भविष्य में निवेश की पुकार


इस सप्ताह का आयोजन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (कौन), यूनीसेफ़, अनेक देशों के स्वास्थ्य मंत्रालयों और नागरिक संगठन, एक साथ मिलकर आयोजित करते हैं.

इस साल, यह सप्ताह WHO के ‘स्वस्थ्य शुरुआत, आशावान भविष्य’ अभियान के तहत आयोजित किया जा रहा है.

इसके दौरान माताओं और शिशुओं को स्तनपान के पूरे सफ़र में समुचित स्वास्थ्य सेवाएँ और सहायता देने पर ज़ोर दिया जाएगा.

इसका उद्देश्य हर माँ को उचित जानकारी, प्रशिक्षित सलाहकारों से मदद, और ऐसा पारिवारिक, चिकित्सीय और कार्यस्थल वातावरण सुनिश्चित करना है, जो स्तनपान को प्रोत्साहित करे और माँ को सशक्त बनाए.

दीर्घकालिक स्वास्थ्य निवेश

स्तनपान केवल शिशु का पोषण नहीं, बल्कि समाज का दीर्घकालिक स्वास्थ्य निवेश है.

इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर धन ख़र्च कम होता है, बच्चों की बौद्धिक क्षमता में सुधार आता है, आर्थिक उत्पादन बढ़ता है और सम्पूर्ण पीढ़ियों को बेहतर शुरुआत मिलती है.

7 अप्रैल 2025 को, विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर शुरू हुआ, ‘स्वस्थ शुरुआत, आशावान भविष्य’ अभियान में, साल भर तक मातृ व नवजात मृत्यु दर को समाप्त करने और महिलाओं के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने पर ज़ोर देगा.

यूनीसेफ़ भारत में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए महिलाओं के साथ मिलकर प्रयास कर रहा है.

यूनिसेफ / UNI148848 / विश्वनाथन

टाली जा सकने वाली लाखों मौतें

वर्तमान अनुमानों के अनुसार, हर साल क़रीब 2 लाख 60 हज़ार महिलाओं की गर्भावस्था या प्रसव के दौरान मृत्यु हो जाती है, जबकि 20 लाख शिशु अपने जन्म के पहले महीने में दम तोड़ देते हैं.

साथ ही, लगभग 20 लाख शिशु मृत पैदा होते हैं, यानि हर 7 सेकंड में एक मौत, जिसे टाला जा सकता था.

यह स्थिति चिन्ताजनक है. अगर, मौजूदा गति जारी रही, तो 80 प्रतिशत देश, 2030 तक मातृत्व से जुड़ी मृत्यु दर को कम करने के लक्ष्य से पिछड़ जाएँगे, और हर तीन में से एक देश, शिशु मृत्यु दर में कमी के लक्ष्य से भटक जाएगा.

बेहतर देखभाल की ज़रूरत

महिलाओं और परिवारों को, गर्भावस्था से लेकर प्रसव और प्रसवोत्तर समय तक, ऐसी गुणवत्तापूर्ण देखभाल की ज़रूरत है, जो न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और सामाजिक रूप से भी उनका साथ दे.

स्वास्थ्य प्रणालियों को प्रसव सम्बन्धी जटिलताओं, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, गै़र-संक्रामक रोगों और परिवार नियोजन जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए ख़ुद को विकसित करना होगा.

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