
यूनेस्को की इस गाइड का नाम है – ‘Enhancing Universal Accessibility during Cultural Festival: 2015 Edition Durga Puja in Kolkata’.
यह ये दिशा-निर्देश, पूजा आयोजकों, सुलभता (accessibility) विशेषज्ञों और विकलांग व्यक्तियों के संगठनों से बातचीत के बाद तैयार किए गए हैं. इसमें पालन करने के लिए, स्पष्ट मानक उपाय बताए गए हैं.
यह दस्तावेज़ संयुक्त राष्ट्र के ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन’ और भारत के ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016’ पर आधारित है.
इस मार्गदर्शिका का सन्देश स्पष्ट है: विकलांग व्यक्तियों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि डिज़ाइन और क्रियान्वयन में साझीदार बनाया जाए.
भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर शॉम्बी शार्प ने कहा है कि सुलभ पहुँच से, संस्कृति और समुदाय, दोनों मज़बूत होते हैं. “जब विकलांगजन दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों में पूरी तरह शामिल होते हैं, तो उत्सव पूरे समुदाय के लिए अधिक समृद्ध और अर्थपूर्ण बन जाता है.”
उन्होंने इन दिशानिर्देशों को सतत विकास लक्ष्यों की “किसी को भी पीछे नहीं छोड़ने” की प्रतिबद्धता की दिशा में उठाया एक ठोस क़दम बताया.
संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन – यूनेस्को ने 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था.
इसी सन्दर्भ में, वर्तमान पहल को “जीवित विरासत” की सुरक्षा की दिशा में अहम माना गया है.
यूनेस्को में दक्षिण एशिया के लिए क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक और प्रतिनिधि टिम कर्टिस कहते हैं, “भविष्य के लिए इसे सुरक्षित रखने के लिए ज़रूरी है कि यह सभी के लिए सुलभ हो.”
यह मार्गदर्शिका यूनेस्को के 2003 के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण कन्वेंशन और विकलांगजन के अधिकारों पर कन्वेंशन के साथ पूरी तरह संरेखित है.
प्रदेश स्तर पर अधिकारियों ने मिलकर इस पहल को आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया.
पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना एवं संस्कृति विभाग के प्रधान सचिव शांतनु बासु ने कहा, “जब दुर्गा पूजा को यूनेस्को सूची में शामिल किया गया, तो इसका मतलब था कि हमारे ऊपर सतत और साझा ज़िम्मेदारी है.”
उन्होंने समावेशन, सामुदायिक भागेदारी और कला को ऐसे मूल्यों के रूप बताया जो “समाज और अर्थव्यवस्था के बीच की खाइयों को पाटने में सहायक होते हैं.”
सुलभ व समावेशी उत्सव की ओर
इन दिशानिर्देशों में दुर्गा पूजा समितियों को स्पष्ट और व्यावहारिक उपाय अपनाने के लिए कहा गया है, ताकि सभी लोग इन उत्सवों में पूरी तरह भाग ले सकें. इनमें शामिल हैं:
• पंडाल, रैम्प और शौचालय जैसी जगहें सभी के लिए आसानी से पहुँचने योग्य हों.
• जानकारी सबको समझ आए और वो सांकेतिक भाषा, ब्रेल और ऑडियो में भी उपलब्ध हो.
• कार्यक्रम ऐसे हों कि विकलांगजन भी सक्रिय रूप से भाग ले सकें.
• भीड़ और आपात स्थिति के लिए साफ़-सुथरे सुरक्षा एवं बचाव नियम हों.
• स्वयंसेवकों को शिष्ट व असरदार मदद देने का प्रशिक्षण दिया जाए.
• व्यवहार और सोच में बदलाव लाया जाए, ताकि हर व्यक्ति के साथ सम्मान एवं गरिमा से पेश आया जाए.
स्पष्ट मार्गदर्शन से न केवल विकलांगजन, बल्कि पहली बार आने वालों की भी मदद होती है. बैठने की व्यवस्था हर उस व्यक्ति के काम आती है जिसे थोड़ी देर आराम चाहिए हो.
यूएन इंडिया और यूनेस्को का मानना है कि दुर्गा पूजा को सुलभ बनाने का यह प्रयास देशभर के अन्य सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों के लिए आदर्श बन सकता है.
इसके आर्थिक और सामाजिक लाभ भी स्पष्ट हैं: सुलभ उत्सव व्यापक भागेदारी आकर्षित करते हैं, समुदायिक रिश्तों को मज़बूत करते हैं और सांस्कृतिक सहनसक्षमता बढ़ाते हैं.
जैसे-जैसे पूरे पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के पंडाल तैयार हो रहे हैं, समितियों, अधिकारियों और स्वयंसेवकों के लिए सन्देश साफ़ है: हर योजना में शुरुआत से ही सुलभता को शामिल करें.
यूनेस्को के शब्दों में, इससे दुर्गा पूजा, “सहयोगी कलाकारों और डिज़ाइनरों के लिए एक समृद्ध मंच” बनकर उभरेगी.



