Homeकठिन मौसमी हालात, अडिग किसान: फ़सल बीमा और टैक्नॉलॉजी से मिला सहारा

कठिन मौसमी हालात, अडिग किसान: फ़सल बीमा और टैक्नॉलॉजी से मिला सहारा


मध्य प्रदेश के 29 वर्षीय युवा किसान अर्जुन सिंह, भोपाल से लगभग 40 किलोमीटर दूर बौद्धिकला गाँव में रहते हैं. उनके साथी बेहतर कामकाज की तलाश में शहरों की ओर पलायन रहे हैं, लेकिन अर्जुन खेती में ही अपनी आजीविका का साधन ढूंढ रहे हैं.

शरबती गेहूँ के लिए मशहूर सीहोर ज़िले में अर्जुन उन गिने-चुने किसानों में से हैं जो फ़सल बीमा, तकनीक और सामूहिक मोलभाव जैसे उपायों को अपना करके मौसमी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं.

अर्जुन बताते हैं, “खेती बचपन से मुझे प्रेरित करती रही है. अपने हाथों से कुछ उगते देखना ऐसा सुख देता है, जो कोई दूसरा काम नहीं दे सकता.”

मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले में किसान, अर्जुन सिंह.

© UNDP INDIA/VIKAS GUPTA

खेती पर दाँव

भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी अब भी खेती से जुड़ी है, लेकिन यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में केवल 14 प्रतिशत योगदान देता है. यह असमानता ग्रामीण क्षेत्रों से शहर की ओर होने वाले पलायन को बढ़ावा देती है.

फिर भी, अर्जुन जैसे युवा किसान अपने गाँव और ज़मीन से जुड़े रहने का विकल्प चुनते हैं – कुछ परम्परा की वजह से और कुछ मजबूरी में, ख़ासतौर पर ऐसे समय में, जब जलवायु परिवर्तन ने ग्रामीण जीवन की बुनियादी चुनौतियों को नया रूप दे दिया है.

अर्जुन तीन एकड़ भूमि पर खेती करते हैं. हर साल उन्हें नई मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं: मार्च में तेज़ गर्मी, जून में पानी की कमी, और कटाई के ठीक पहले बारिश. कभी एक एकड़ गेहूँ से 2.4 मीट्रिक टन तक उपज मिलती है, तो कभी 30 से 50 प्रतिशत तक का नुक़सान हो जाता है.

“2017 में गर्मी बहुत जल्दी आ गई. मिट्टी सूख गई और उपज हो ही नहीं पाई.” इस घटना से उन्हें समझ आ गया कि बिना बीमा व्यवस्था के, एक बुरा साल पूरे परिवार की आर्थिक नींव हिला सकता है.

किसानों को ड्रोन के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है और आधुनिक खेती की तकनीकों से परिचित करवाया जा रहा है.

© UNDP INDIA/VIKAS GUPTA

बीमा, एक जीवनरेखा

2018 में अर्जुन ने भारत सरकार की प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना (PMFBY) अपनाई. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा समर्थित यह योजना आज लाखों किसानों के लिए सुरक्षा उपाय है. 2023 में ख़राब मौसम से हुए नुक़सान के बाद उन्हें 21 हज़ार रुपये की रक़म मिली.

वे कहते हैं, “नुक़सान पूरा तो नहीं हुआ. लेकिन हम पूरी तरह बिखरने से बच गए. घर का ख़र्च, दवाइयाँ और बच्चों की फ़ीस, सब ख़र्च इससे ही निकला.”

आज बीमा उनके लिए बीज और ख़ाद जितना ही ज़रूरी है. “लोग सोचते हैं 1,000-1,500 रुपये से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. लेकिन जब फ़सल चौपट होती है, तो यही छोटी रक़म जीवन बचा लेती है.”

नई फ़सलें, पुरानी पहचान

अर्जुन ने लम्बे समय तक शरबती गेहूँ की खेती की, लेकिन लगातार नुक़सान के कारण अब वो धान और मक्का जैसी टिकाऊ फ़सलों की ओर मुड़ने लगे हैं. फिर भी उनका मन गेहूँ से जुड़ा है.

वो कहते हैं, “यही हमारी शान है. यही हमें सबसे अलग करता है.”

अपने स्वाद और महीन दानों के लिए प्रसिद्ध शरबती गेहूँ, मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के सीहोर और विदिशा ज़िलों में उगाई जाने वाली एक ख़ास क़िस्म है.

© UNDP INDIA/VIKAS GUPTA

तकनीक और नैटवर्क

अर्जुन खेती को आगे बढ़ाने के लिए केवल बीमे पर निर्भर नहीं हैं. वो किसान उत्पादक संगठन (FPO) का हिस्सा भी हैं, जो छोटे किसानों की फ़सलें मिलाकर बड़ी मंडियों तक पहुँचाता है. वे ड्रोन से खाद छिड़कने और मोबाइल ऐप से मौसम व दाम की जानकारी लेने जैसे प्रयोग भी करते हैं.

उनका व्हाट्स ऐप ग्रुप, खेती के अनुभवों, सरकारी योजनाओं और सलाह का आदान-प्रदान करता है. उनके चचेरे भाई और दोस्त भी अब कम पानी वाली फ़सलें अपनाने और उनका बीमा कराने लगे हैं.

PMFBY के तहत अब तक 78 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों पर काम किया है और 50 करोड़ हैक्टेयर से अधिक भूमि पर बीमा दिया है.

अब तक 1,800 अरब रुपये के दावे चुकाए जा चुके हैं, जिससे 22.8 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं. इनमें से 90 प्रतिशत छोटे और सीमान्त किसान हैं, जिनके लिए यह योजना बर्बादी और बचाव के बीच का फ़र्क साबित हुई है.

भविष्य पर भरोसा

अर्जुन का मानना है कि खेती कभी पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं होगी. लेकिन बीमा, तकनीक और सामूहिक सीख के सहारे यह टिकाऊ ज़रूर बन सकती है.

“बीमा आपको अमीर नहीं बनाएगा. लेकिन यह आपको बर्बादी से बचा सकता है.”

यही वजह है कि वे अब भी हर साल ज़मीन पर बीज बोते हैं – हर बार नई उम्मीद के साथ.

इस लेख का विस्तृत संस्करण पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

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